संवेदना की भाषा हिन्दी है। – डाॅ0 सदानन्दप्रसाद गुप्त

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन आज पूर्वाह्न 11.00 बजे से हिन्दी संस्थान के यशपाल सभागार में किया गया।

दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजलि के उपरान्त प्रारम्भ हुए कार्यक्रम में वाणी वन्दना की प्रस्तुति श्रीमती रंजना मिश्रा द्वारा की गयी। मंचासीन अतिथियों का उत्तरीय द्वारा स्वागत श्री शिशिर, निदेशक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने किया।
मुख्य वक्ता डाॅ0 कुमुद शर्मा, दिल्ली ने हिन्दी दिवस के अवसर पर कहा-आज हम संचार युग में हैं। भूमण्डलीकरण ने राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। भाषा एवं संस्कृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हिन्दी भाषा पर आज मनन-चिन्तन की आवश्यकता है। आज हिन्दी भाषा के साथ संख्या बल तो है लेकिन उसके पास स्वाभिमान की कमी दिखायी पड़ती है। हिन्दी भाषा के पास स्वाभिमान होना आवश्यक है। मीडिया की ताकत से हिन्दी नहीं बल्कि हिन्दी से मीडिया बढ़ी है। स्थानीय भाषाओं को सम्मान व संरक्षण की आवश्यकता है। विडम्बना यह है कि आज हिन्दी भाषा में अच्छे अनुवादक नहीं हैं।


डाॅ0 रमेश चन्द्र शाह ने ‘शब्द का बताओ कहना क्या है शब्द बताओ कहना क्यूँ है‘। बहुरूपिया पर लिखी एक कविता- ‘एक जनम काटना भारी हो रहा महाराज‘। ‘खुला है घर, एक सांकल भर लगी है‘। जागते रहो कविता में पढ़ा- जैसी कद काठी हो वैसी ही लाठी हो, वासुदेव, वासुदेव……‘। तुलसी एक्सप्रेस में उन्होंने पढ़ा- ‘उतरा कोई न चढ़ा कोई‘, चित्रकूट करीब है उतरोगे क्या‘, कितना सुहावना जंगल है, बेमानी लगती है दुनियाँ की चहल-पहल‘। नाम काट दो कविता पढ़ी-‘कक्षा में रहकर भी यही लगता है कि मैं बाहर खड़ा हूँ, सुना है कि मेरा बाप भी इसी स्कूल मंे पढ़ता था, उसका नाम रहने दो मेरा नाम काट दो‘। ‘बेमतलब रोने से बेमतलब हँसने से, धूल होगी आरम्भ में, धूल होगी अन्त में‘ जैसी कविताओं का पाठ किया।
अध्यक्षीय सम्बोधन में डाॅ0 सदानन्दप्रसाद गुप्त, मा0 कार्यकारी अध्यक्ष, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान ने कहा – आज हम हिन्दी के उन मनीषियों को याद करने का दिन है जिन्होंने हिन्दी भाषा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, दुर्गा प्रसाद मिश्र उनमें अग्रणी हैं। दुर्गा प्रसाद ने हिन्दी के लिए काफी संघर्ष किया। आज हमारे भीतर हिन्दी के प्रति स्वाभिमान नहीं जाग पा रहा है। हिन्दी भाषा के प्रति हीनता ग्रन्थि के कारण हम पीछे होते चले जा रहे हैं जो कि विचारणीय है। स्वत्व ही स्वाभिमान का प्रण है। हमें अपनी भाषा के प्रति स्वाभिमान जगाना होगा। संवेदना की भाषा हिन्दी ही होनी चाहिए। डाॅ0 शाह की कविताएँँ बौद्धिक कविताएँ हैं। मंचीय कविताएँ हृदय में स्थान नहीं बना पाती जबकि डाॅ0 शाह की कविताएँ जन मानस के हृदय में स्थान बनाने में सक्षम है।
श्री अशोक वाजपेयी, सांसद ने साहित्यानुरागियों को हिन्दी दिवस की बधाई दी। इस अवसर पर संस्थान के वरिष्ठ वित्त एवं लेखाधिकारी श्रीनिवास त्रिपाठी की पुस्तक ‘व्यापार, भू क्षेत्र और प्रौद्योगिकी वैश्विक अर्थव्यवस्था मंे आर्थिक संकट‘ का लोकार्पण मंचासीन अतिथियों द्वारा हुआ।
डाॅ0 सदानन्द प्रसाद गुप्त, मा0 कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप मंे डाॅ0 रमेश चन्द्र शाह, भोपाल, विशिष्ट अतिथि के रूप में डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी, लखनऊ एवं मुख्य वक्ता के रूप में डाॅ0 कुमुद शर्मा, दिल्ली आमंत्रित थे। इस अवसर पर डाॅ0 शाह की कविताओं पर वक्तव्य देने के लिए डाॅ0 आनन्द कुमार सिंह, भोपाल भी आमंत्रित थे।
कार्यक्रम का संचालन एवं आभार डाॅ0 अमिता दुबे, सम्पादक, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान ने किया।