गांव से गुजरेगा आत्मनिर्भर भारत का रास्ता- अरिमर्दन सिंह

 

विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पत्र सूचना कार्यालय, रांची का झारखंड के संदर्भ में विशेष लेख।

गांव हर कामकाजी व्यक्ति के लिए संबल का प्रतीक हैं। बड़े-बड़े शहरों या विदशों में काम करने वाले भारतीय जब भी थोड़े उदास होते हैं, किसी परेशानी में फंसते हैं, किसी त्योहार में अकेले पड़ जाते हैं या वहां प्रदूषण आदि जब बढ़ जाता है तो अचानक से गांव की याद आती है। मैंने कई लोगों को कहते सुना है और सुनता आ रहा हूं, ‘ज्यादा दिक्कत होगी तो गांव चला जाऊंगा, वहीं अपने घर में रहूंगा और खेती-बारी करूंगा। भले कोई सुख सुविधा न मिले पर वहां सुकून तो मिलेगा। ‘ ऊपर की ये बातें अधिकांश भारतीयों के जीवन में लागू होती हैं, चूंकि भारत को गांवों का देश भी कहा जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े भी कहते हैं कि भले ही शहर बढ़ रहे हों, लेकिन गांवों की आबादी में भी इजाफा हुआ है।
गांव हमेशा से प्रासंगिक रहे हैं लेकन एक वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने गांव की महत्ता को आज और बढ़ा दिया है। चूंकि इस वायरस का फिलहाल कोई इलाज नहीं है इसलिए सरकार ने इसका प्रसार न हो इसके लिए लगभग दो महीने से ज्यादा का लॉकडाउन घोषित किया। इस लॉकडाउन के दौरान अचानक तेजी से चल रहा देश थम गया और जो जहां था वहीं फंस गया। इतने समय के दौरान शायद ही ऐसा कोई आदमी हो जिसे अपने गांव की याद न आई हो। हमारे देश का श्रमिक वर्ग जो विभिन्न राज्यों में अपनी श्रम शक्तिध्कौशल का इस्तेमाल कर देश की अर्थव्यवथा को गति दे रहा है वह अपने-अपने गांव आने के लिए आतुर दिखा। श्रमिक सब छोड़-छाड़ कर पहले अपने गांव लौटना चाहते थे, इसकी तसदीक रोज टीवी और समाचार पत्र कर रहे थे। इस दौरान कई दुर्भाग्यपूर्ण हादसे भी हुए फिर भी कई लोग दिखे जो साइकिल, पैदल, खुले ट्रकों में, ट्रेन से जैसे भी हो गांव लौटने पर अड़े दिखे।
विभिन्न राज्यों में रह रहे लाखों श्रमिकों मे से फिलहाल काफी लोग अपने-अपने प्रदेश लौट चुके हैं और लौटने का क्रम लगातार जारी है। कोरोना के भय और लॉकडाउन की दिक्कतों के कारण वापस लौटे श्रमिकों में से अधिकांश का कहना है कि अगले कुछ महीनों तक वे अपने गांव में ही रहेंगे। इतने बड़े पैमाने पर गांव में मानव संपदा लौटने से किसी भी प्रदेश की दशा और दिशा में बदलाव आ सकता है और वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है। उन्होंने हाल ही में एक विशेष आर्थिक पैकेज का भी ऐलान किया है जिसकी मदद से इस लक्ष्य को पाया जा सकता है। गांव कैसे सशक्त हों, हर हाथ को काम मिले, किसानों को आर्थिक समस्या न हो और उत्पादों का भी उचित मूल्य मिले इससे जुड़ी हर बात का ध्यान रखा गया है।
केंद्र सरकार ने मनरेगा में औसत मजदूरी दर 182 से बढ़ाकर 202 रुपये कर दिया है साथ ही बारिश के दिनों में काम मिलने में दिक्कत न हो इसके लिए मनरेगा में काम के दायरे को बढ़ाया गया है। केंद्र सरकार 40 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन भी कर रही है इससे 300 करोड़ मानव दिवस रोजगार पैदा करने में आसानी होगी। जल संरक्षण से संबंधित कार्य और पशु शेड के निर्माण से हर हाथ को काम देने में सक्षम होंगे। झारखंड में जल संरक्षण के लिए पिछले साल डोभा निर्माण (एक प्रकार का खड्ड जहां पानी जमा होता है) बड़े पैमाने पर मनरेगा के तहत किए गए थे जिसका लाभ गर्मी के मौसम में किसानों को खेतों की नमी बरकरार रखने में मिला था, पैदावार में भी बढ़ोत्तरी हुई थी। झारखंड की भौगोलिक संरचना के हिसाब से जल संरक्षण करना आवश्यक है और इससे सबंधित कार्यों को मनरेगा में जोड़े जाने से यहां रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
सही मायनों में देखा जाए तो किसान और श्रमिकों की खुशहाली ही देश की आर्थिक तरक्की की नींव हैं। लॉकडाउन की अवधि में पीएम किसान निधि से मिली सहायता ने किसानों को साहूकार और महाजनों से मुक्ति दिलाई है। केंद्र सरकार ने 18,700 करोड़ रुपये डीबीटी (डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर) के माध्यम से किसानों के खाते में ट्रांसफर किए हैं। तीन महीनों तक उन्हें यह राशि दी जानी है। फसलों की बिक्री भी किसान अब ऑनलाइन कर सकते हैं। झारखंड के कई किसानों ने लॉकडाउन की अवधि में गेहूं, तरबूज आदि की बिक्री ई-नाम पोर्टल पर की है जिससे उन्हें बाजार में अपने उत्पाद भी नहीं ले जाने पड़ते हैं, खेतों से ही बिक्री संभव हो जाती है। इसके लिए जरूरत है जागरुकता की ताकि अन्य किसानों को भी इसका लाभ मिल सके। छोटे किसान भी समूह बनाकर अपने उत्पादों की बिक्री इसके माध्यम से कर सकते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर किसानों से सरकारें अनाज की खरीद कर रही हैं। इससे उन्हें औने-पौने दाम में साहूकारों को अनाज बेचने से मुक्ति मिली है।
गावों के लिए पशुधन का बड़ा महत्व है। देश में शायद ही ऐसा कोई गांव हो जहां पशुपालन नहीं होता है। इनकी जरूरत खेती-किसानी के साथ-साथ आहार के लिए भी होती है। वन संपदा और हरे-भरे क्षेत्रों से परिपूर्ण होने के कारण झारखंड में बड़े पैमाने पर पशुपालन होता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विशेष आर्थिक पैकेज में 15 हजार करोड़ रुपये का एक पशु पालन आधारभूत ढांचा विकाष कोष स्थापित करने का ऐलान किया है। इसी तरह से जड़ी-बूटी की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए चार हजार करोड़ रुपये का ऐलान किया गया है।
झारखंड खनिज संसाधनों से भरा-पूरा क्षेत्र है। झारखंड में देश का एक तिहाई कोयला पाया जाता है। प्रदेश के लाखों श्रमिकों को इससे रोजगार मिल रहा है। कोयला खनन के क्षेत्र में केंद्र सरकार नीतिगत सुधार करेगी ताकि कोयला उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ सके। रुपये प्रति टन की निर्धारित व्यवस्था की बजाय राजस्व साझेदारी की व्यवस्था बनाने की योजना है। इससे पहले केवल अंतिम उपयोग संबंधी स्वामित्व के साथ स्व उपयोग करने वाले उपभोक्ता ही बोली लगा सकते थे पर नए बदलावों से कोई भी पार्टी किसी भी कोयला ब्लॉक के लिए बोली लगा सकती है और खुले बाजार में बेच सकती है। इससे संबंधित 50 ब्लॉकों की पेशकश तुरंत की जानी है। इसका झारखंड को सीधा फायदा होगा। रोजगार के नए साधन तो सृजित होंगे ही साथ ही साथ श्रमिकों को तत्काल काम मिलेगा।
ऐसा प्रायरू देखा गया है कि संकट की घड़ी में कोई भी परिवार एकजुट होता है, आज हम एक अदृश्य दुश्मन का मुकाबला कर रहे हैं। इस समय हम और पूरा देश एकजुटता से ही इसे परास्त कर सकते हैं। ऐसे में हमारा दायित्व बनता है कि हम हर उस व्यक्ति को संबल दें, हर हाथ को काम मिले उस रास्ते को बताने का प्रयास करें जिससे भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया बनने की ओर अग्रसर हो।

– अपर महानिदेशक, पत्र सूचना कार्यालय रांची