Fri. Feb 21st, 2020

सरकारें सरकारी कर्मचारियों और बैंक कर्मचारियों के साथ कर रही है भेदभाव

फैमिली पेंशन में सुधार-बेंकों में फैमिली पेंशन मात्र 15फीसदी मिलती है जो लगभग 7500 से 8000 के लगभग होती है जबकि सरकारी क्षेत्र एवं रिजर्व बैंक में यह 30फीसदी है। लगभग 72000 फैमिली पेंशनर्स इस समय देश भर में हैं जिनमें 90फीसदी महिलाएं हैं जिनके लिए आज के समय में इतनी कम रकम में घर का खर्च चलाना असंभव हो रहा है।हमारी मांग है कि फैमिली पेंशन को रिजर्व बैंक के अनुरूप किया जाए । यह बात आल इंडिया बैंक रिटायरीज फेडेरेशन बैंक के रिटार्यड कर्मचारी और अधिकारी पेंशन और उससे जुड़ी समस्याओं को लेकर अपनी दो दिवसीय केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गहन विचार विमर्श के बाद प्रेसवार्ता के दौरान अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक निजी होटल चारबाग में कही।।

उन्होंने बताया कि रिजर्व बैंक के फॉर्मूला के अनुरूप पेंशन पुनरीक्षण बेंकों में लागू पेंशन रिजर्व बैंक की पेंशन योजना जैसी ही है। पिछले 24 वर्षों में पेंशन का कोई भी पुनरीक्षण नहीं हुआ है जबकि लगातार प्रत्येक 5 वर्ष में बैंक कर्मियों के लिए वेतन वृद्धि समझौते हो रहे हैं। इस कारण से वर्ष 2000 के समय सेवानिवृत्त लोगों कोआज के मुकाबले बहुत ही कम पेंशन राशि का भुगतान हो रहा है।बढ़ती हुई उम्र में वांछित चिकित्सा सुविधा एवं अन्य मूलभूत आवश्यकताओं के लिए यह पेंशन बहुत ही कम है। हाल में मार्च माह में सरकार ने रिजर्व बैंक में पेंशन में वृद्धि कर इसे 3.63 गुना तक बढ़ा दिया है। हमारी मांग है कि रिजर्व बैंक के अनुरूप हमारी पेंशन को भी इसी प्रकार बढ़ाया जाए। यहाँ हम यह स्पष्ट कर दें कि इस वृद्धि से बैंकों की लाभप्रदता पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा क्योंकि बैंकों में लगभग रु 1,80,000 करोड़ का पेंशन फंड है जिसके ब्याज मात्र से ही यह भुगतान संभव है

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एआईबीआरएफ की मांग है कि भारत सरकार तुरंत सभी पेंशनर्स की पेंशन रिजर्व बैंक फार्मूले के अनुरूप बढ़ाए।
उन्होंने कहा कि बैंक रिटायरीज के लिए ग्रुप स्वास्थ्य बीमा योजनारू वर्ष 2015 में इंडियन बैंक्स ऐसोसिएशन ने बैंक रिटायरीज के लिए ग्रुप स्वास्थ्य बीमा योजना कार्यरत बैंक कर्मियों के साथ प्रारम्भ की परंतु रिटायरीज को स्वयं उसका प्रीमियम भरना पड़ता है। पिछले 4 वर्षों में प्रीमियम की राशि में लगभग 5 गुना वृद्धि हो कर यह रु 7500- से बढ़ कर लगभग रु 34000 पहुँच चुका है जिसके कारण 60फीसदीः से ज्यादा लोगों अर्थात करीब 2.5 लाख लोगों को बीमा छोडने को मजबूर होना पड़ा क्योंकि वह अपनी अल्प पेंशन से इस बीमा रकम को भरने में असमर्थ हैं। विशेष तौर से फॅमिली पेंशनर्स इस योजना से बाहर हो गए हैं। जहां भारत सरकार ने वर्तमान ओजस्वी प्रधान मंत्री के नेत्रत्व में आयुष्मान भारत योजना प्रारम्भ करके रु 5 लाख तक के चिकित्सा व्यय को मुफ्त कर दिया है, सेवा निवृत्त बैंक कर्मी इससे लाभान्वित नहीं हो पाये हैं। कोढ़ में खाज की तरह बीमा प्रीमियम पर 18ः जीएसटी भी चार्ज किया जा रहा है और अस्पताल के बिल में भी इतनी ही रकम चार्ज की जा रही है।
एआईबीआरएफ की मांग है कि यह जीएसटी वरिष्ठ नागरिकों से न लिया जाए और स्वास्थ्य बीमा को सभी के लिए सर्वथा सुलभ बनाया जाए एवं इस रकम पर बैंक प्रबंधन सब्सिडि प्रदान करे।
राजीव कुमार अग्रवाल ने बताया कि बैंक रिटायरीज के सभी लंबित मुद्दों को परस्पर वार्तालाप से सुलझाया जाए
यह अत्यंत खेद का विषय है कि 2 लाख की सदस्यता होने के बावजूद इंडियन बैंक्स ऐसोसिएशन और भारत सरकार एआईबीआरएफको मान्यता देने से विरत है और हमारे साथ हमारे लंबित मुद्दों पर बातचीत से कतरा रहे हैं। हमें अपने सारे मुद्दों को सुलझाने के लिए सर्विस यूनियन्स के माध्यम से वार्तालाप करना पड़ता है।
हमारी मांग है कि भारत सरकार और इंडियन बैंक्स ऐसोसिएशन हमसे सीधे वार्तालाप कर के हमारे लंबित मुद्दों को सुलझाने का कष्ट करे क्योंकि बढ़ती उम्र के कारण हमारे बहुत से सदस्य अपनी समस्याओं के निदान के पहले ही कल कवलित होते जा रहे हैं।
राजीव कुमार अग्रवाल ने बताया कि बैंकों में जमा राशि पर बीमाराशि की सीमा में वृद्धि- हाल में पंजाब – महाराष्ट्र सहकारी बैंक पर रिजर्व बैंक द्वारा रोक लगाए जाने से वहाँ के ग्राहकों को अत्यंत तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है।बैंकों में जमा रकम वर्तमान में केवल रु एक लाख तक डीआईसीजीसी द्वारा बीमित है। सभी वरिष्ठ नागरिक अपने सेवा निवृत्ति लाभ बैंकों में ही जमा करते हैं। किसी बैंक के बैठ जाने पर ऐसे ग्राहक का केवल रु 1 लाख ही बीमित होने से ऐसे वरिष्ठ नागरिकों के सामने जीवन यापन की समस्या खड़ी हो जाती है। हमारी मांग है कि इस बीमित रकम को बढ़ा कर कम से कम रु 5-10 लाख तक किया जाए।
राजीव कुमार अग्रवाल ने बताया कि बैंकों का परस्पर विलयरूभारत सरकार ने हाल ही में 10 सरकारी क्षेत्र के बैंकों के विलय की घोषणा की है। इससे पहले 3 सरकारी और 5 सहयोगी बैंकों का विलय हो चुका है। एआईबीआरएफका मानना है कि ऐसे विलय से किसी का फायदा नहीं होता अपितु जहां कर्मचारी बल को शाखाओं की बंदी एवं फलस्वरूप होने वाले स्थानांतरण से अत्यंत परेशानियों का सामना करना पड़ता है, ग्राहकों को भी कोई फायदा नहीं पहुंचता। ऐसे विलय से जहां सैंकड़ों सालों से अवस्थित बैंकों का अस्तित्व समाप्त होता है, वहीं दो बैंकों के बीच उनकी कार्यसंस्कृति का परस्पर विलय नहीं हो पाता। ऐसे विलय बेरोजगारी को भी बढ़ाते हैं।अतः एआईबीआरएफऐसे विलय का विरोध करती है और इस बारे में विभिन्न कर्मचारी संगठनों द्वारा किए जा रहे आंदोलनों का समर्थन करती है।

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