Tue. Feb 18th, 2020

विधायी संस्थाओं के सदस्यों की जिम्मेदारी सवाल उटाने के लिए बढ जाती है-ओम बिरला


राष्ट्रमंडल संसदीय संघ भारत क्षेत्र के 7वें सम्मेलन का समापन
विधायी संस्थाएं आम लोगों के सरोकारों, उनकी आशाओं और आकांक्षाओं को मुखरित किए जाने के विश्वसनीय मंच होते हैं, जिन्हें सभा में जन प्रतिनिधियों द्वारा प्रभावी ढंग से उठाया जाना चाहिए। यह बात जन प्रतिनिधियों की भूमिकाश् विषय पर 16 जनवरी को आरंभ हुए राष्ट्रमंडल संसदीय संघ भारत क्षेत्र के दो दिवसीय 7वें सम्मेलन के समापन पर लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लखनऊ विधान सभा में कही।
सम्मेलन के पहले पूर्ण सत्र अर्थात् बजट प्रस्तावों की संवीक्षा के लिए जन प्रतिनिधियों की क्षमता बढ़ाना का उल्लेख करते हुए, श्री बिरला ने कहा कि विधानमंडलों को कार्यपालिका की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक सजग प्रहरी की तरह कार्य करना चाहिए। इसके लिए, यह आवश्यक है कि जन प्रतिनिधियों को वित्तीय शब्दावली और बजटीय प्रक्रियाओं की बेहतर समझ हो। उन्होंने बजटीय प्रक्रिया की बारीकियों को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों की क्षमता को बढ़ाने के लिए अनुभवी सांसदों और पदाधिकारियों की टीम को भेजने का प्रस्ताव रखा। श्जन प्रतिनिधियों का ध्यान विधायी कार्यों की ओर बढ़ानाश् संबंधी दूसरे पूर्ण सत्र के बारे में, श्री बिरला ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध सभी प्रक्रियात्मक साधनों का प्रभावी रूप से इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य विधानमंडलों को सत्रों के दौरान लोक सभा द्वारा आरंभ किए गए पैटर्न के अनुसार विधायी कार्य संबंधी संक्षिप्त जानकारी सत्र आयोजित करने पर भी विचार करना चाहिए । श्री बिरला ने कहा कि प्रतिनिधिगण इस बात पर एकमत हैं कि विधानमंडलों को व्यवधानों के बिना सुचारू रूप से कार्य करना चाहिए । इसके लिए, नियम बनाए जाएं और विधानमंडलों में नियमों में एकरूपता लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए । सम्मेलन में उभरी आम सहमति का जिक्र करते हुए श्री बिरला ने कहा कि संसद सहित सभी विधानमंडलों की डिबेट्स को एक प्लेटफार्म पर लाने का प्रयास किया जायेगा। इसके अलावा इस बात पर भी आम सहमति थी की ऐसे सम्मेलन ग्राम पंचायत, नगरपालिका अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष , युवाओं और महिलाओं के स्तर पर भी आयोजित किये जाएं।
समापन सत्र में प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल, आनंदीबेन पटेल ने कहा कि विगत वर्षों के दौरान विधानमंडलों के कार्य के स्वरूप में बदलाव हुए हैं। उनके यह भी विचार थे कि आज के समय विधानमंडल न केवल विधि निर्माण का कार्य कर रहे हैं, अपितु आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में भी अग्रणी हैं। इसके परिणामस्वरूप, विधायी निकायों के सदस्यों के रूप में जन प्रतिनिधियों की भूमिका भी बदल गई हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभा के भीतर और बाहर जन प्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाता है। अतः उनसे सामाजिक समस्याओं को समझने और विधानमंडलों तथा संसद के माध्यम से उनके समाधान में प्रमुख भूमिका निभाए जाने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि जन प्रतिनिधियों के रूप में यह आवश्यक है कि वे संसदीय परंपराओं, नियमों और प्रक्रियाओं का इस प्रकार प्रयोग करें जिससे विकासात्मक कार्य और जन कल्याण सुनिश्चित हो सके।
डेलीगेट्स को धन्यवाद् देते हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष, हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि बदलती परिस्थिति में विधायकों का काम बढ़ा है और साथ ही उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है। उन्होंने कहा अपने कार्य को सम्पादित करने के लिए विधायकों को को यह समझना आवश्यक है कि ज्ञान और अनुभव का इसमें अत्यंत महत्व है। लेकिन केवल संविधान और सदन की नियमावली पढ़कर सफल नहीं हुआ जा सकता। सफलता के लिए यह आवश्यक है कि विधायक सदन की कार्यवाही में नियमित रूप से भाग लें और गरिमामयी भाषा में अपने विचार सदन में रखें। उन्होंने जोर देकर कहा कि विधायक सदन को आदर और श्रद्धेय भाव से देखें।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति, रमेश यादव ने भी समापन समारोह में धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया ।
सम्मेलन में केंद्र शाखा (भारत की संसद) और राज्यध्संघ राज्य क्षेत्र शाखाओं से 35 डेलिगेट्स ने भाग लिया। साथ ही,अस्ट्रेलिया और साउथ ईस्ट एशिया सी पी ए रीजन के प्रतिनिधियो ने भी हिस्सा लिया। इसके अलावा, इन दो दिनों के सम्मेलन में, मंत्रिगण और उत्तर प्रदेश विधान सभा और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लगभग 270 विधायक मौजूद रहे।

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